Facts About यह लिखकर जेब में रख ले किसी मंत्र की जरूरत नहीं "Vashikaran Without Revealed +91-9779942279




"दस प्रतिनिधि कहानियाँ" सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।

किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार राजी सेठ ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं :'उसका आकाश', 'तीसरी हथेली', 'अंधे मोड़ से आगे', 'पुल' , 'अमूर्त कुछ', 'तुम भी.

इनमें धुँधलाए गाँव हैं मैले कस्बे, भीड़-भरे महानगर ! दिन-रात हांफते-कांपते, यंत्रवत जीते लोग !

इतिहास, परंपरा और संस्कृति पर लिखने वाले बिरले लेखकों में हैं वशिष्ठ, जो अपनी यायावर प्रवृत्ति के कारण दूसरे राहुल कहे जाते हैं । जहाँ इतिहास की बात आई है, वशिष्ठ ने निरपेक्ष होकर तथ्यों के आधार पर केवल ऐसी बात की है जो प्रामाणिक हो । यूरोपियन इतिहासकारों की टिप्पणियां ज्यों की त्यों न उतारकर उन पर तर्कसंगत विवेचन के साथ साक्ष्यों के आधार पर निष्कर्ष निकालना  है ।

If you like any person and wish him for getting inside your everyday living then also you will be able to use This system to have the sights and affections of that particular person. Utilizing the guide of this technique You may as well get rid of variances out within your married everyday living and could make your married daily life filled with affections and attractions.

किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। 

रामकथा के सार्वदेशिक स्वरूप को विभिन्न भारतीय भाषाओं में जांचना-परखना ही इस उपक्रम का अभीष्ट है।

इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।

More than the study course of ten decades, writer and photographer Michael Benanav, investigated the remarkable situations that enabled his father’s dad and mom to survive the horrors from the Holocaust in Eastern Europe whilst most of their relatives and neighbors perished all-around them.

लेखकों की, लेखकों द्वारा, लेखकों के लिए लिखी गई ये झूठे साहित्यिक प्रजातंत्र की कहानियां न होकर, उस मानसतंत्र की कहानियां हैं जो आज के भयावह यथार्थ को केवल उजागर ही नहीं करतीं बल्कि पाठकविहीन एकरसतावादी कहानियों की जड़ता को तोड़ते हुए यह साबित करती हैं कि कहानी अपने समय के मनुष्य की तमाम बेचैनियों और भयावहता को वहन करते हुए उसी मनुष्य को अपने समय को समझने और उसके संत्रस्त अस्तित्व को एक नई दृष्टि देने की भूमिका अदा करती हैं।

जिन कुछ लेखकों ने गद्य की विविध् विधओं में अपनी रचनाशीलता से हिंदी को समृद्ध व गौरवान्वित किया है उनमें शिवानी का नाम अग्रगण्य है। कहानीकार व उपन्यासकार के रूप में तो उन्होंने असंख्य पाठकों का मन मोहा ही; निबंध, संस्मरण, रेखाचित्र, यात्रावृत्तांत व लोकसाहित्य के द्वारा अनेक अनछुए-अनकहे व्यक्तियों-प्रसंगों-स्थानों की आंतरिकता व्यक्त की। स्वाभाविक है ऐसे रचनाकार के मूल्यांकन more info हेतु धैर्य, लगन और बुद्धिमत्ता की आवश्यकता होती है। कहना न होगा कि सुशील बाला ने ‘शिवानी के कथेतर साहित्य का सांस्कृतिक अध्ययन’ पुस्तक में इन गुणों का परिचय देते हुए विषय का भलीभांति प्रतिपादन किया है। वे भूमिका में लिखती हैं, ‘शिवानी के कथेतर साहित्य में सामाजिक चेतना, नैतिक मान्यताएं, राजनीतिक परिदृश्य इत्यादि सभी बिंदुओं में परंपरागत और नवागत तत्त्वों का रेखांकन किया गया है। आधुनिक, राजनीतिक एवं आर्थिक यथार्थ कथेतर साहित्य का तीव्र स्वर है।’ पुस्तक छह अध्यायों में विभक्त है। इनमें क्रमशः शिवानी के निबंध, संस्मरण, रेखाचित्र, यात्रावृत्तांत व लोक साहित्य का विवेचन है। पुस्तक के प्रारंभ में शिवानी के कथेतर साहित्य का भलीभांति परिचय दिया गया है।

दरअसल वह लडाई किसानो, विद्यार्थियों, डॉक्टरों, वकीलों, मज़दूरों, नौकरीपेशा परिवार के लोगों ने लडी थी । कैसे? इसी के लिए यह उपन्यास है ।

नीलेश रघुवंशी ‘घर निकासी’ में प्रगीतात्मकता का सार्थक उपयोग कर सकीं। ‘पानी का स्वाद’ की कविताओं में काव्य फलक का विस्तार दिखा। ‘अंतिम पंक्ति’ की आधी कविताएँ आख्यानमूलक हैं। कहीं लैंडस्केप, कहीं दृष्य.श्रव्य का कोलाज, कहीं कथा.कहानी।

यदि इनके अभी तक प्रकाशित हजारों लेखों और दर्जनों पुस्तकों को देखा जाए तो इन्हें दूसरा राहुल कहा जा सकता है । राहुल जी ने बहुत जगह पूरे के पूरे गजेटियर उतार डाले । वशिष्ठ ने ऐसा नहीं किया । इन्होंने संस्कृति को बहुत करीब से देखा । जो देखा, वह लिखा । संस्कृति को निष्पक्ष नजरिए से देखा, परखा, समझा है और फिर लेखनीबद्ध किया है । आशा है, यह संस्कृति श्रृंखला पाठकों, शोधकर्ताओं के लिए उपयोगी सिद्ध होगी ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *